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नैनीताल में बनी बड़ी, मुंगौड़ी की देशभर से मांग, लीला साह ने वोकल फार लोकल के नारे को क‍िया सार्थक

नैनीताल में बनी बड़ी, मुंगौड़ी की देशभर से मांग, लीला साह ने वोकल फार लोकल के नारे को क‍िया सार्थक

पहाड़ के उत्पाद न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं बल्कि बीमारियों के उपचार में मददगार होते हैं। कोरोना काल मे डॉक्टर व शोधकर्ता भी यह साबित कर चुके हैं। इसी वजह से पर्वतीय इलाकों में उगने वाले मडुवा, बाजरा से लेकर गहत, गडेरी आदि की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग बढ़ रही है। भारत सरकार का वोकल फॉर लोकल का नारा भी इसे आगे बढ़ाने में सार्थक सिद्ध हो रहा है। कोरोना काल में आत्मनिर्भरता के साथ ही स्वस्थ्य व बिमारियों से बचाने वाला मूल मंत्र लेकर तमाम लोग  काम भी हो रहा है। नैनीताल की लीला साह ने इम्यूनिटी बढ़ाने में कारगर बड़ी-मुगौड़ी का कारोबार शुरू किया तो विदेशों से भी डिमांड आने लगी है। अब लीला का वोकल फ़ॉर लोकल का कदम रोजगार में तब्दील हो गया है। सालों से बड़ी मुगौड़ी का कारोबार कर रही लीला की इससे खूब कमाई हो रही है। सर्दी भगाने और बिमारियों को दूर करने का एकदम रामबाण इलाज  बड़ी मुगौड़ी का मुह मांगा दाम भी मिल रहे हैं।

800 रुपये क‍िलो तक ब‍िक रही

पहाड़ की बड़ी और मुंगौड़ी 600 से 800 रुपये प्रति किलो बिक रहे उत्पादों की मांग देश के साथ विदेशों से भी आ रही है जिसको पूरा करना भी चुनौती बन गया है। पहाड़ में शीत ऋतु आने के साथ गांव घरों की छतों पर बड़ी मुगौड़ी बनाई जाती हैं। भूजा यानि पेठा, ककड़ी, लौकी पापड़ के साथ उड़द, मूंगदाल और गडेरी से तैयार होने वाले ये बडी मुगौड़ी इम्यूनिटी बढाने में कारगर होती हैं। पेट सबंधी बिमारियों के साथ अन्य बिमारियों और वायरस को खत्म करने की भी इनमें क्षमता होती है। साथ ही इन केमिकल-फ्री आर्गेनिक इन उत्पादों में  विटामिन,मिनरल्स,प्रोटीन,कैल्शियम,आयरन कार्बोहाइड्रेट फास्फोरस की मात्रा भरपूर होती है। बीडी पांडेय अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ एमएस  दुग्ताल का कहना है कि बड़ी मुगौड़ी के साथ पहाड़ के अधिकांश उत्पाद शरीर की इम्युनिटी तो बढ़ाते ही है, बीमारियां भी दूर करते हैं।

पहाड़ी खानपान से हो रहे दूर

पहाड़ के लोग पहाड़ी खान पान से दूर हो रहे हैं लेकिन कोरोना ने इन उत्पादों के स्वाद को लोगों से जोड़ दिया है। अब ये रोजगार का साधन भी बन रहा है लेकिन सरकार को भी लोकल उत्पादों के लिये ठोस नीति तैयार करने की जरुरत अब भी है। विशेषकर परंपरागत बीज उत्पादन के साथ ही इन फसलों के विपणन की पुख्ता व्यवस्था की जरूरत है। सिमट रही परंपरागत खेती को प्रोत्साहन मिलेगा, तभी पहाड़ के उत्पादों का स्वाद मिल सकेगा।


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