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नैनीताल में है देश का पहला 146 साल पुराना आर्य समाज मंदिर

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नैनीताल, किशोर जोशी। महर्षि दयानंद सरस्वती ने 1875 में सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक लिखी थी, जिसमें आर्य समाज के सम्पूर्ण दर्शन की झलक मिलती है। 1882 में किताब में संशोधन किया और 20 भाषाओं में अनुवादित हुई। रामनगर के ढिकुली निवासी गजानंद छिमवाल महर्षि दयानंद की विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित थे।  गजानंद में 20 मई 1874 को सत्यधर्म प्रकाशिनी सभा की स्थापना नैनीताल में की। यह आर्य समाज आंदोलन की नैनीताल में शुरुआत थी। शिल्पकार जाति के उत्थान के प्रारंभ इसी सभा के साथ शुरू हुआ।

इतिहासकार प्रो अजय रावत के अनुसार सत्यधर्म प्रकाशिनी सभा ने शिल्पकार समाज के बड़े नेता खुशीराम को बेहद प्रभावित किया। खुशीराम ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 7 अप्रैल 1875 को जब स्वामी दयानंद सरस्वती ने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की तो गजानंद छिमवाल व उनके साथियों ने सत्यधर्म प्रकाशिनी सभा में आर्य समाज का अनुसरण किया। साथ ही सभा द्वारा तल्लीताल कचहरी रोड में गजानंद छिमवाल के निजी आवास पर आर्य समाज मंदिर की स्थापना की,  जो न केवल भारत में बल्कि दुनिया का पहला आर्य समाज मंदिर था। आजादी के बाद आर्य समाज को मल्लीताल स्थानांतरित किया गया और वह वर्तमान समय में भी है

प्रो रावत के मुताबिक इस स्थानांतरण का श्रेय तत्कालीन पालिकाध्यक्ष जसोद सिंह बिष्ट व कुमाऊं कमिश्नर आरबी शिवदसानी को जाता है। उन्होंने यह भूमि आजादी के बाद ही आर्य समाज को आवंटित कर दी थी। महान स्वतंत्रता सेनानी मुंशी हरिप्रसाद टम्टा भी आर्य समाज से बहुत प्रभावित थे। अलग राज्य आंदोलन में भी नैनीताल आर्य समाज के सचिव स्वं माधवानंद मैनाली ने अहम भूमिका निभाई। नैनीताल आर्य समाज मंदिर की ओर से वेद सप्ताह के तहत हर साल वेदों का प्रचार प्रसार किया जाता है।

नैनीताल का 179वां जन्मोत्सव : पी बैरन ने नहीं कमिश्‍नर जीडब्ल्यू ट्रेल ने की थी नैनीताल की खोज

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Naintial Online

नैनीताल : नैनीताल की 1841 में हुई खोज का श्रेय अब तक पी बैरन को ही दिया जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत अब इसमें नई जानकारी सामने लाए हैं। राज्य अभिलेखागार लखनऊ से हासिल पुस्तक ‘वांडरिंग इन द हिमाला’ के हवाले से प्रो. रावत कहते हैं कि ब्रिटिश राज में पी बैरन नहीं बल्कि तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर जीडब्ल्यू ट्रेल सबसे पहले 1823 में नैनीताल आए थे। जबकि पी बैरन पहली बार 1839 तथा दूसरी बार 1841 में नैनीताल आए थे। ‘वांडरिंग इन द हिमाला’ पुस्तक के माध्यम से आगरा अखबार में स्वयं उन्होंने इस बात का उल्लेख भी किया। 18 नवंबर 1842 को जब वह तीसरी बार नैनीताल आए तब यहां नगरीकरण शुरू हो गया था। इस लिहाज से पी बैरन ने 1841 में नहीं बल्कि ट्रेल ने 1823 में ही नैनीताल की खोज कर ली थी। नैनीताल की खोज से जुड़ा यह तथ्य जर्नल ऑफ लेंडस्केप हिस्ट्री बर्किंघम, इग्लैंड में प्रकाशित हुआ है।

नैनीताल के जन्मोत्सव की पूर्व बेला पर प्रो. रावत ने कहा कि किताब में पी बैरन ने खुद लिखा है कि मुझसे पहले जीडब्ल्यू ट्रेल नैनीताल आ चुके हैं, मगर उन्होंने किसी को नहीं बताया। अंग्रेज कमिश्नर ट्रेल का स्थानीय जनता सम्मान करती थी। उस दौर के अंग्रेज यात्री बिशप हीवर ने भी कुमाऊं की यात्रा की थी, उन्होंने भी अपनी किताब में लिखा है कि ट्रेल बदरीनाथ यात्रा करने वाले पहले अंग्रेज यात्री थे। उन्होंने ही अंगे्रजी सरकार के खिलाफ जाकर व अंग्रेजों से ही चंदा लेकर बदरीनाथ मार्ग का सुधार करने के साथ नालों पर पुल बनाए। ट्रेल 1816 से 1836 तक कुमाऊं कमिश्नर रहे। उनकी पत्नी भी पहाड़ की थी, वह यहीं रहना चाहते थे, मगर बच्चों की वजह से उन्हें जाना पड़ा।

तब पवित्र स्वरूप में थी सरोवर
उस दौर में पवित्र स्थान होने की वजह से हल्द्वानी से आने वाले लोग हनुमानगढ़ी में जबकि कालाढूंगी के रास्ते आने वाले लोग बारापत्थर में जूते चप्पल उतारने के बाद ही नैनीताल आते थे। पवित्र स्थल होने की जानकारी होने पर पी बैरन ने भी सरोवर के बारे में किसी को नहीं बताया। उनका मानना था कि अंग्रेज इस पवित्र स्थल को खराब कर देंगे।

ट्रेल ने किया पहला बंदोबस्त

इतिहासकार प्रो. रावत के अनुसार 1815 में अंग्रेजों ने कुमाऊं में अधिकार जमाया और तब पहले कमिश्नर गार्डनर बनाए गए। उनका कार्यकाल छह माह रहा, मगर गोरखाओं के साथ राजनीतिक संबंधों की वजह से उनका अधिकांश समय काठमांडू में ही व्यतीत हुआ। छह माह बाद गार्डनर के सीनियर असिस्टेंट ट्रेल को कुमाऊं कमिश्नर बनाया गया। ट्रेल ने ही 1823 में भू राजस्व के लिए गांवों के राजस्व मानचित्र बनाए। तब नैनीताल को छकाता परगना कहा गया था। संवत 1880 में बंदोबस्त होने की वजह से यह 80 साला बंदोबस्त के रूप में चर्चित है। प्रो. रावत के अनुसार नैनीताल को बसाने व संवारने में ट्रेल के साथ ही ठेकेदार मोती राम साह व कमिश्नर लूसिंगटन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। साह ने ही नैनीताल की पुरानी कोठियां बनाई जबकि लूसिंगटन ने 1841 मेें नगरीकरण शुरू किया।

नैनीताल जन्मोत्सव कार्यक्रम आज

नैनीताल के 179वें जन्मोत्सव पर बुधवार को श्रीराम सेवक सभागार में सांकेतिक रूप से सर्वधर्म पूजा कार्यक्रम अपराह्नï दो बजे से शुरू होगा। मुख्य अतिथि अपर पीसीसीएफ डा. कपिल जोशी, विशिष्ट अतिथि विधायक संजीव आर्य होंगे। आयोजक दीपक बिष्ट ने बताया कि वरिष्ठ नागरिकों की विचार गोष्ठी होगी।

हल्द्वानी- गेटवे ऑफ़ कुमाऊँ

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हल्द्वानी उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में स्थित एक नगर है । यह उत्तराखंड के सर्वाधिक जनसँख्या वाले नगरों में से एक है । इसे कुमाऊँ का प्रवेश द्वार कहा जाता हैं । यह विमानों तथा ट्रेन के लिए आखिरी स्टेशन हैं । “हल्द्वानी” शब्द कुमाऊनी शब्द “हल्दू -वानी” जिसका अर्थ “हल्दू का जंगल” के नाम पे रखा गया ।

हल्द्वानी के आकर्षण
हल्द्वानी में घूमने के लिए प्रमुख स्थानों में गौला बैराज, माँ शीतला देवी मंदिर, जमरानी, मैगी पॉइंट, बेल बाबा मंदिर तथा रानीबाग़ प्रमुख हैं ।
हल्द्वानी के पूर्व दिशा में गौला नदी तथा कालीचौड मंदिर है इस मंदिर में शिवरात्रि के दिन श्रद्धालु अधिक संख्या में उपस्थित होते हैं । पश्चिम में लामाचौड़ और कालाढूंगी में उपजाऊ कृषि मैदान हैं जो विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में मिलते है। उत्तर दिशा में रानीबाग़ नामक स्थान है । जहाँ हिन्दुओ का पवित्र चित्रशिला नामक शमशानघाट है । यहाँ प्रतिवर्ष मकरसक्रांति के दिन मेला लगता है । तथा दक्षिण में पंतनगर विशविद्यालय स्थित हैं । जो कृषि अनुसन्धान के लिए प्रसिद्ध हैं ।

जीवनशैली
हल्द्वानी में प्रमुख रूप से कुमाऊनी लोगों की अधिकता है । अर्थात यहाँ अधिक संख्या में कुमाऊनी लोग निवास करते हैं । परन्तु इसके अतिरिक्त यहाँ बहुत से नगरों और क्षेत्रों के लोग भी निवास करते है । दो दशक पहले तक हल्द्वानी एक छोटा सा क़स्बा था । परन्तु पिछले कुछ वर्षो में बढ़ते नगरीकरण के चलते यह एक व्यापारिक क्षेत्र के रूप में उभरा है । और यहाँ कई आधारभूत सुविधाओं मे वृद्धि हुई हैं ।

शिक्षण
हल्द्वानी में कई विद्यालय हैं, जो की उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करते है- जिनमे आर्यमान विक्रम बिड़ला, सैकरैड हार्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, निर्मला कान्वेंट, हर गोविन्द सुयाल, एम.बी. इंटर कॉलेज और एच.एन. इंटर कॉलेज आदि प्रमुख है ।
उच्च शिक्षा (Higher Education) के लिए एम.बी.पी.जी. कॉलेज, गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज, पंतनगर यूनिवर्सिटी जिसका कृषि अनुसंधान के लिए देश में प्रमुख संस्थान है। आम्रपाली संस्थान लामाचौड़ जो की होटल मैनेजमेंट तथा टेक्निकल एजुकेशन के लिए है, तथा गवर्नमेंट द्वारा संचालित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज स्थित हैं । और युवाओ को रोज़गार परक शिक्षा के लिए यहाँ धानमिल रोड स्थित आई टी आई भी प्रमुख हैं ।
दूरस्थ शिक्षा के लिए तीन पानी स्थित उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी भी प्रमुख है । जहाँ ४० से भी अधिक कोर्सेज उपलब्ध हैं । इसके अतिरिक्त यहाँ बहुत से एजुकेशन सेण्टर है । जो की लघु – अवधि के लिए आजीविका उन्मुख ट्रेनिंग देते हैं ।

उत्तराखंड का प्रमुख नगर होने के कारण यहाँ पिछले २० वर्षो में नगरीकरण बहुत तेजी से हुआ हैं । तथा यह नगर अपनी “ग्रीन-सिटी” की उपाधि को बचाये रखने में संघर्षरत हैं ।

कॉर्बेट के होटल

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corbett hotels

जानिये कॉर्बेट के होटल के बारे मे

Premium Hotel Corbett (6,500/8,500 rs per night)

aahanaresort
Aahana the Corbett Wilderness
The resort derives its name from the Sanskrit word- Aahana (first rays of the rising sun) because the first rays of the sun fall on the resort and bathe the landscaped property in golden light.

Website : https://www.aahanaresort.com/


alayaresort
Alaya Resorts & Spa
Surrounded by the serenity and charm of the mountains, Alaya Resorts & Spa by Parfait, Jim Corbett is the ideal place to ‘relax’.

Website : https://www.alayaresorts.com/


solluna
Solluna Resort
The word “Solluna” depicts the captivating beauty of the sun (sol) and the moon (Luna) being observed at the same time at the dusk.

Website : http://www.sollunaresort.com/

Luxury Hotel Corbett (4,500/6,500 rs per night)

gatewayresort
The Gateway Resort Corbett
Experience nature up close at this picturesque hotel surrounded by lush green forests. Located on the banks of River Kosi close to the renowned Corbett National Park.

corbetttuskertrail
Corbett Tusker Trail
the most distinguished and exclusive resort in Corbett Park. The Corbett Tusker Trail combines a tradition of exceeding guest expectations with contemporary modern interiors and highly intimating services.

Website : http://www.corbetttuskertrail.com/


corbettthebaghspa
Corbett The Baagh Spa & Resort
At Corbett The Baagh Spa & Resort, we leave no stone unturned (pun unintended) to give you the most memorable experience of the jungle.

Website : http://www.corbettthebaagh.com/

Budget Hotel Corbett (3,200/4,800 rs per night)


gajrajresort
Gajraj Trails Resort
Gajraj Trails Resort welcomes you to the oldest national park in India, with warm hospitality and signature services.

Website : http://www.gajrajtrailsresort.in/


jims-jungle-retreat
Jim’s Jungle Retreat
Jim’s Jungle Retreat is a wildlife lodge in Corbett Tiger Reserve, nestled between the Himalayan foothills in the north and the ancient Shivaliks in the south.

Website : http://www.jimsjungleretreat.com/

पंगोट – पक्षिओ का स्वर्ग

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Pangot birds

पंगोट नैनीताल से 17.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन हैं | पंगोट बर्ड वाचर्स के लिए स्वर्ग माना जाता जाता हैं | क्योकि यहाँ बर्ड्स की लगभग 580 प्रजातियां पाई जाती हैं | जिनमे से कई दुर्लभ प्रजाति के बर्ड्स है | पंगोट के चारो ओर खूबसूरत घाटी और पहाड़िया हैं |
इसके अतिरिक्त अगर आप पक्षी प्रेमी नहीं है तो आपको थोड़ी निराशा हो सकती हैं | मगर यदि आप पहाड़ो की ठंडी वादियों मे शांत जगह की तलाश कर रहे हैं | तो पंगोट आप के लिए श्रेष्ठ हैं | क्योकि यहाँ नैनीताल की तुलना में बहुत कम भीड़-भाड़ तथा शोर-शराबा हैं | पंगोट मैं रुकने के लिए आस-पास कई होटल तथा काटेज हैं | जहा आप रुक सकते हैं |
पंगोट चारो ओर खूबसूरत घाटी और पहाड़ियो से घिरा एक छोटा गांव हैं | अगर आप पक्षी प्रेमी नहीं हैं तो आपको थोड़ी निराशा हो सकती हैं क्योकि यहाँ नैनीताल की तरह आस पास कोई पर्यटन स्थल नहीं हैं |

खुर्पाताल – रहस्यमयी झील

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khurpatal Nainital

खुर्पाताल नैनीताल से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित टूरिस्ट डेस्टिनेशन है | यह झील 5500 ft (1635 mt) के altitude पर स्थित हैं। ब्रिटिश मैगज़ीन के अनुसार खुर्पाताल की खोज 1840 से 1850 के मध्य की मानी जाती हैं | खुर्पाताल झील का नाम खुर्पाताल इसलिए पड़ा क्योकि जब आप इसे ऊपर से देखोगे तो इसकी झील का नज़ारा खुर के समान दिखता है। इस ताल का पानी साफ़ तथा गर्म होता है तथा इसे गर्म पानी के ताल के नाम से भी जाना जाता है। सर्दियों के समय में भी इस झील का पानी हल्का गुनगुना होता हैं तथा इस ताल मैं फिशिंग भी होती है।

खुर्पाताल मे बोटिंग नहीं होती है। और न ही यहाँ टूरिस्ट एक्टिविटी होती हैं। खुर्पाताल झील अपना रंग बदलती रहती हैं।  इस झील का रंग कभी लाल तो कभी हरा तो कभी नीला दिखाई देता है। इस कारण इसे रहस्मयी झील भी कहा जाता है। खुर्पाताल झील से थोड़ी दूर ऊपर मनसा देवी मंदिर हैं। मान्यता हैं की इस मंदिर से खुर्पाताल झील मैं आप पत्थर फेकते हैं और अगर आपका पत्थर इस झील मैं पहुंच जाता हैं तो आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है।
खुर्पाताल के पास कई गेस्ट हाउस, होटल, रिसोर्ट है, जहा आप रुक सकते हैं।

देखें Video : https://youtu.be/RbjLE4sFuU0

 

नौकुचियाताल

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नौकुचियाताल भीमताल से 6 किलोमीटर तथा नैनीताल से इस ताल की दूरी २६.२ कि॰मी॰ है। नौकुचियाताल की खोज 1734-1800 के मध्य मानते हैं | नौकुचियाताल का अर्थ नौ कोने वाली झील से होता हैं | इस झील के नौ कोने हैं | पौराणिक कथाओ के अनुसार यदि कोई व्यक्ति इस झील के किसी भी कोने मे खड़ा होकर सभी कोनो की झलक देख ले तो वह मोक्ष की प्राप्ति हेतु धुए के एक बादल के रूप मे अदृश्य हो जाता हैं | मगर एक झील के कोने से सभी नौ कोने दिखे, ऐसी किसी जगह की जानकारी उपलब्ध नहीं  हैं |

नौकुचियाताल की झील काफी गहरी तथा लम्बी हैं | यहाँ आप नाव मे बैठकर बोटिंग का आनंद ले सकते हैं | और इसके साथ ही आप नौकुचियाताल मैं पैराग्लाइडिंग, ज़िपलाइन कोर्स्सिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, ट्रैकिंग सहित अनेक गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं |

अधिक जानने के लिए ऊपर दिए विडियो को देखे|

जानिये सातताल के बारे में

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सातताल उत्तराखंड राज्य में स्थित एक सुंदर एवं विख्यात पर्यटक स्थल है। ‘कुमाऊँ’ अंचल के सभी तालों में ‘सातताल’ का जो अनोखा और नैसर्गिक सौन्दर्य है,
वह किसी दूसरे ताल का नहीं है। सातताल नैनीताल से २६ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं | सातताल की खोज E. Stanlay Jones के Father ने 1880 मे की थी | सातताल की प्रमुख विशेसता यह हैं की यह घने जंगलो के बीच स्थित हैं | जहा आप प्रकति की शांति का आनंद ले सकते हो | सातताल का नाम सातताल इसलिए पड़ा क्योकि एक टाइम पे सातताल जाते समय पूरे सात ताल पड़ते थे | महरा गांव नामक स्थान से सातताल की शुरूआत होती हैं | महरा गांव नैनीताल तथा भीमताल के मध्य में पड़ता हैं | छ: झीलों के बाद जो आखिरी झील पड़ती हैं उसे सातताल झील कहते हैं | सातताल जाने के मार्ग मैं जो पहली झील पड़ती हैं उसे नल दमयंती ताल कहते हैं | दूसरी झील का नाम गरुण ताल, तीसरी झील का नाम पूर्ण ताल ,चौथे का नाम सूखा ताल , पांचवे का नाम लक्ष्मण ताल, छटवी झील का नाम रामताल, और सातवीं झील का नाम सीताताल |
प्रथम झील नल दमयंती ताल हैं जिसका आकार पंचकोड़िय है | पौराणिक कथाओ के अनुसार इस ताल का नाम राजा नल और उनकी पत्नी दमयंती के नाम पे पड़ा | जिन्होंने यहाँ आकर समाधी ली थी |
दूसरी झील गरुण ताल, इस ताल का नाम गरुण ताल इसलिए पड़ा क्योकि महाभारत काल मे इस ताल को को द्रौपदी ने रसोई के रूप मे प्रयोग किया था | द्रौपदी के द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला सिलबट्टा आज भी इस जगह पर हैं | कुछ लोगो के अनुसार एक ज़माने मे पांडव लोग यहाँ निवास करते थे |
तीसरी तथा चौथी झील का नाम पूर्ण ताल तथा सूखा ताल था | इन दोनों तालो का अस्तित्व लापरवाही के चलते समाप्त हो गया हैं |
पांचवी, छ:, तथा सातवीं झील का नाम राम, लक्ष्मण तथा सीता ताल है | माना जाता है की राम, लक्ष्मण तथा सीता वनवास के दौरान यही आकर रुके थे | और इसी जगह भीम ने हिडिम्बा से गन्धर्व विवाह भी किया था | हिडिम्बा देवी का मंदिर यहाँ से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं |

नैनीताल का इतिहास

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नैनीताल का इतिहास

नैनीताल इंडिया के टॉप 5 टूरिस्ट डेस्टिनेशन मे से एक हैं | स्कंद पुराण के मानस खण्ड में नैनीताल एक ताल है जिसे त्रि-ऋषि सरोवर कहा जाता था। यहाँ तीन ऋषियों की एक प्रसिद्ध कथा है। ये ऋषि थे-अत्रि, पुलस्त्य और पुलह। जब इन तीन ऋषिओ को नैनीताल में कहीं जल नहीं मिला तो उन्होंने एक गडढा खोदा और उसे तिब्बत की मानसरोवर झील के जल से भरा। जनश्रुति के अनुसार जो भी मनुषय नैनीताल की इस झील में डुबकी लगाता है उसे मानसरोवर के बराबर पुण्य मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि नैनीताल 64 शक्तिपीठो में से एक है। कहा जाता है क़ि जब भगवान शिव देवी सती के शव को ले जा रहे थे। तब देवी सती की आँख यहाँ गिरी थी इसलिए इस स्थान का नाम नैन-ताल पड़ गया। बाद में इसे नैनीताल कहा जाने लगा। आज नैना देवी के मंदिर में देवी सती के शक्ति रूप की पूजा होती है।

नैनीताल की खोज 1841 में एक ब्रिटिश व्यापारी, P. Barron, जो शाहजहांपुर में चीनी व्यापारी था, ट्रेक करते हुए यहाँ आये, और उन्होंने यहाँ – पिलग्रिम लॉज (नैनीताल में पहला यूरोपियन शैली का भवन) की स्थापना की। माना जाता है – कि इस ब्रिटिश व्यापारी P. Barron ने नैनीताल शहर की नीव डाली। अपने संस्मरण में वो लिखते हैं।

“हिमालय में 1,500 मील (2,400 किमी) ट्रेक के दौरान मैंने , अपनी जीवन की-सबसे खूबसूरत जगह को देखा।”

1846 में कैप्टेन मैडन, और धीरे धीरे दुसरे अग्रेज सरकार के अधिकारी और सैनिक – यहाँ आने लगे, जिन्होंने यहाँ कई यूरोपियन स्थापत्य कला की इमारते और भवन बनाये, जो आज भी यहाँ देखी जा सकती हैं, और फिर यह जगह अग्रेज अधिकारीयों और सैनिको का यह शहर पसंदीदा हेल्थ रिसोर्ट बन गया, जहाँ वो हर वर्ष गर्मियों में आते.

मजे क़ि बात तो यह हैं की भीमताल और नौकुचियताल को 1782-1840 के मध्य खोजा जा चूका था |
नैनीताल मे 18 सितम्बर 1880 मे एक भयानक भूस्खलन हुआ | यह भूस्खलन इतना जबरदस्त था जिसमे 151 लोग दबकर मर गए | इस भूस्खलन के कारण नैना देवी मंदिर भी छतिग्रस्त हो गया था | बाद मे फिर नैना देवी मंदिर नए तरीके से बनवाया गया | 1860 के मध्य तक कुछ स्कूलों का भी निर्माण करवाया गया जिसमे आल सेंट, सेंट जोजेफ आदि प्रमुख थे | और 1906 के मध्य तक हाईकोट तथा शेरवुड कॉलेज बन गए थे | अंग्रेजो को नैनीताल इतना पसंद था की वो इसे स्विट्ज़रलैंड के समान मानते थे |

2001 से पहले नैनीताल को छोटी विलायत भी कहते थे | जब 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड उत्तरप्रदेश से अलग हुआ तब नैनीताल मे हाईकोट बना | यहाँ आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट भी है जिसे ARES के नाम से जानते हैं |

कैंची मंदिर

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हमारा देश – उच्च आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त संतो, सन्यासियों की भूमि रहा है, नीम करौली बाबा या महाराज जी की तुलना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों मे होती है। इनका जन्म स्थान ग्राम अकबरपुर जिला फ़िरोज़ाबाद उत्तर प्रदेश में है |

कैंची मंदिर और आश्रम, नैनीताल से 23 किलोमीटर दूर नैनीताल-अल्मोड़ा रोड़ पर भवाली के समीप समुद्र तल से 1400 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।
यह मंदिर देश की राजधानी दिल्ली से 321 किलोमीटर, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 343 किलोमीटर और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 390 किलोमीटर की दूरी पर है |

यह आश्रम बाबा नीम करोली महाराज को समर्पित हैं … बाबा नीम करोली आश्रम में हर वर्ष लाखो श्रृदालु आते हैं, और बाबा जी का आशीर्वाद पाते हैं, उनकी आध्यात्मिक करुणा, दया और आशीर्वाद अब भी शृदालुओ पर बरस हैं,और उन्हें कितने ही कष्टों से दूर करता हैं,

बाबा नीम करोली महाराज को कई लोग हनुमान जी यानी रूद्र अवतार मानते हैं |
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